Monday, 26 November 2018

पाकिस्तान का सच सामने लाने की रणनीति बनाए भारत

पाकिस्तान और कुलभूषण जाधव पर नवभारत टाइम्स में प्रकाशित मेरा लेख.

कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान ने एक और विडियो जारी किया है, जिसमें जाधव पाकिस्तान के प्रशासन का धन्यवाद कर रहे हैं और भारतीय राजनयिक की आलोचना कर रहे हैं। ऐसा कैसे संभव है कि कुलभूषण जाधव जैसे व्यापारी जिसे पाकिस्तान ने मौत की सजा सुना दी हो वह उनकी आवभगत की तारीफ करे। ऐसा ही विडियो पाकिस्तान पहले भी जारी कर चुका है, जिसमें कुलभूषण अपने को भारतीय नौसेना का कमांडर बता रहे हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने विडियो जारी किये जाने की इस घटना को सामान्य बात बताया है। उनके अनुसार पाकिस्तान से इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती। उसने दबाव बनाकर कुलभूषण से ऐसा करवाया होगा।
भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए पाकिस्तान लंबे समय से अपने यहां आतंकियों को पनाह और ट्रेनिंग देता आ रहा है। आतंकवाद का जो बीज पाकिस्तान ने सालों पहले बोया अब वह उसी पर भारी पड़ रहा है। आतंकवाद की इस दोधारी तलवार ने पाकिस्तान को बुरी तरह से खोखला करना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान अब अपने देश में फैल रहे आतंकवाद के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रहा है। यह अपने आप में एक बेबुनियाद बात है। कुलभूषण जाधव का मामला भी इसी कोशिश का एक हिस्सा है, जिसमें पाकिस्तान अपनी गलतियों को छुपाने के लिए भारत पर पाकिस्तान को अस्थिर करने का आरोप लगा रहा है।
ऐसा लंबे समय से कहा जाता है कि पाकिस्तान को वहां की लोकतांत्रिक सरकार नहीं बल्कि अल्लाह, आर्मी और अमेरिका चलाते हैं। अपने आपको लगातार प्रांसगिक बनाए रखने के लिए आर्मी और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने एक स्थायी दुश्मन खोज रखा है जिसका नाम है: भारत। आर्मी और आईएसआई देश की कट्टरपंथी ताकतों को इस्लाम के नाम पर अपने साथ लाते हैं और उनके द्वारा आतंकी संगठन बनाकर भारत को अस्थिर करने की साजिश रचते हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में इन इस्लामिक संगठनों को अरब देशों से भी एक खास तरह का इस्लाम फैलाने के नाम पर पैसा मिला और ये काफी ताककवर हो गए। अब हालत यह हो गई है कि इन्होंने भी पाकिस्तान पर राज करने के मंसूबे पाल लिए हैं। इन्होंने अब अपने राजनीतिक संगठन भी बना लिए हैं और आने वाले समय में चुनाव में हिस्सा लेने का ऐलान कर दिया है। कुछ दिन पहले ही जमात-उत-दावा आतंकी संगठन के मुखिया हाफिज सईद ने भी अपनी पार्टी के चुनाव लड़ने की घोषणा की है। ये आतंकी संगठन अपने आप में इतने ताकतवर हो गए हैं कि जब-तब अपनी ताकत का एहसास पाकिस्तान की सेना, आईएसआई और सरकार को कराते रहते हैं। कट्टरपंथी इस्लाम की जड़ें पाकिस्तान में काफी नीचे तक पहुंच गईं हैं, जिसकी वजह से इन संगठनों को काफी जन-समर्थन भी मिल जाता है। अब इन सभी समस्याओं के लिए पाकिस्तान कुलभूषण जाधव जैसे सामान्य लोगों को गिरफ्तार करके भारत को जिम्मेदार ठहराने का प्रयास करता है।
यह सिर्फ कुलभूषण जाधव मामले की बात नहीं है, इससे पहले सरबजीत सिंह के मामले में हमने देखा कि कैसे उन्हें पाकिस्तान ने पहले प्रताड़ित किया और फिर मार दिया। इसी तरह के मामलों में कई भारतीयों को अफगानिस्तान, ईरान और भारत की सीमा से अगवा किया गया है और उन्हें भारतीय खुफिया एजेंसी का एजेंट करार दे दिया गया और उन पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर मौत की सजा सुना दी गई है। इनमें से किसी भी मामले की चार्जशीट पेश नहीं हुई और सारी कार्यवाही सैन्य अदालत में होती है जबकि इन लोगों के भारतीय सेना में होने के कोई प्रमाण पाकिस्तान के पास नहीं होते। हालांकि यह अतंरराष्ट्रीय समझौते का उल्लंघन है, जिसके तहत किसी आम नागरिक पर सैन्य अदालत में केस नहीं चला सकते। यहां पर बताते चलें कि कुलभूषण जाधव भी अब भारतीय नौसेना में काम नहीं करते और अपने व्यापार के सिलसिले में ईरान गये थे, जहां ईरान सीमा पर उनको पकड़ा गया लेकिन उनपर भी पाकिस्तान की सैन्य अदालत में मामला चला और उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। भारतीय नागरिक पर इस तरह मुकदमा चलने पर पाकिस्तान में भारत के उच्चायोग ने 13 बार चार्जशीट मांगी लेकिन अभी तक उन्हें चार्जशीट की कॉपी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

कोविंद अगर गुमनाम हैं, तो जिम्मेदार कौन है?

राष्ट्रपति चुनाव पर नवभारत टाइम्स में प्रकाशित मेरा लेख.

राष्ट्रपति चुनाव की तस्वीर साफ हो चुकी है। एक तरफ बीजेपी और एनडीए ने बिहार के राज्यपाल और पूर्व राज्यसभा सांसद रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार घोषित किया है तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने 17 राजनीतिक दलों का साथ लेते हुए पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को आगे किया है। जब मीरा कुमार प्रत्याशी घोषित हुईं तो किसी को पूछना नहीं पड़ा कि दरअसल मीरा कुमार कौन हैं, क्योंकि इनके पिता इस देश के उपप्रधानमंत्री रह चुके हैं। वह खुद आईएफएस अधिकारी रही हैं, लोकसभा सांसद रही हैं, केंद्र में मंत्री रहीं और पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान लोकसभा में स्पीकर थीं। जीवन में बहुत कुछ उन्हें विरासत में ही मिला। उन तमाम चीजों के लिए उन्हें कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा, जिसके लिए उस समुदाय को जान की बाजी तक लगा देनी पड़ती है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करती हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मीरा कुमार कांग्रेस की सामंतवादी राजनीति का ही हिस्सा हैं और वह देश की पहली इलीट दलित राजनीतिज्ञ हैं। हमें सोचना होगा कि क्या ऐसे अभिजनवादी को देश का राष्ट्रपति होना चाहिए।
जब रामनाथ कोविंद प्रत्याशी घोषित हुए तो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सवाल उठाए कि आखिर ये कौन हैं? ऐसा करने वाली वह अकेली नहीं थीं। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि वह (कोविंद) राजनीतिक रूप से कमतर हैं, सामाजिक पहचान ज्यादा नहीं हैं। कई ने उनके बारे में सुना नहीं था। कई लोगों ने कहा कि बीजेपी ने कोविंद पर दांव लगाकर बस दलित कार्ड भर खेला है।
अब हम सब जान चुके हैं कि रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल हैं। दो बार के राज्यसभा सांसद रह चुके कोविंद पहले उच्चतम न्यायालय में वकालत करते थे और पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के सहयोगी रह चुके हैं। वह पहले आईआईएम कोलकाता के बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। आजकल वो अखिल भारतीय कोली समाज के अध्यक्ष भी हैं, जिसके अपने सरोकार होते हैं जो मीडिया-सोशल मीडिया के लोगों को ज्यादातर नहीं दिखते या वो देखना नहीं चाहते। यहां सवाल यह उठता है कि इतना सक्रिय राजनीतिक और सामाजिक जीवन होने के बावजूद वो हमें दिखाई क्यों नहीं दिए या ऐसे कहें कि हमारी मीडिया ने उन्हें क्यों नहीं दिखाया?
अब जब कोविंद राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बन गए हैं तो कई सामाजिक-राजनीतिक चिंतकों और पत्रकारों ने यह सवाल उठाया है। वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि कोविंद के बारे मे सवाल पूछना हमारी राजनीतिक पत्रकारिता की हालत बयां करता है जो बाबा लोग और सूत्रों पर पूरी तरह आधारित है। मैंने पहले नहीं बताया कि रामनाथ कोविंद 2010 में बीजेपी के प्रवक्ता भी रह चुके हैं, जहां वो बीजेपी के मीडिया रूम में अपनी टिप्पणी, साक्षात्कार और बाइट देने के लिए उपस्थित रहते थे। लेकिन एक प्रवक्ता के रूप में हमने उनके बारे में बहुत कम सुना और देखा। वह पार्टी की आवाज के रूम में मौजूद थे लेकिन उनकी आवाज बहुतों के लिए मायने नहीं रखती थी।
शायद उस दौर के बीजेपी कवर करने वाले बहुत से पत्रकार उनकी बाइट लेना उचित नहीं समझते थे। वरिष्ठ पत्रकार नितिन गोखले ने ट्विटर पर लिखा कि हमारे न्यूज चैनल के व्यवसाय में पैनलिस्टों के लिए एक अलिखित पदानुक्रम निर्धारित है, जिसे आप नस्लीय या जातीय भेद कह सकते हैं लेकिन यही सच्चाई है। उस समय में मीडिया में कोविंद बिल्कुल ही कम दिखे जब उन्हें दिखना चाहिए था। शायद मीडियाकर्मियों को वह अपमार्केट और दूसरे प्रवक्ताओं जैसे नहीं लगते थे। पत्रकार शायद खुद ही राय बना लेते थे कि टीवी की जनता इन्हें देखने और सुनने में रुचि नहीं लेगी। उस समय रिपोर्टिंग कर चुके एक पत्रकार ने बहुत ही सटीक ढंग से लिखा कि अपने शक्तिशाली माइकों के साथ पत्रकार सारा दिन राजीव प्रताप रूडी, प्रकाश जावड़ेकर और रविशंकर प्रसाद का इंतजार करते रहते थे लेकिन कोविंद की बाइट नहीं लेते थे। वह आगे लिखते हैं कि ऐसा नहीं कि सारी गलती पत्रकारों की ही थी। मीडिया दफ्तरों में बैठे आका तय करते थे कि किसकी बाइट लेनी है और किसे स्टूडियो में बैठाना है। ऐसे समय में जब जब कोई भी उपलब्ध नहीं होता था तब भी कोविंद की बाइट लेने से इनकार कर दिया जाता था।

मोदी के दौर की फिल्म है बाहुबली

फिल्म बाहुबली पर नवभारत टाइम्स में प्रकाशित मेरा लेख.

आंकड़े बता रहे हैं कि बाहुबली भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे बड़ी फिल्म बन चुकी है। फिल्म को रिलीज हुए दस दिन नहीं हुए और 1000 करोड़ रुपए का कोरबार कर अब तक के सारे रेकॉर्ड तोड़ चुकी है और आने वाले दिनों में नए प्रतिमान गढ़ेगी। ऐसे समय में सोचना चाहिए कि इस फिल्म ने ऐसा क्या बताने, दिखाने की कोशिश की गई जो अब तक की फिल्में नहीं कर पा रही थीं।
बाहुबली एक वैभवशाली, गौरवशाली अतीत के भारतीय राज्य और समाज का चित्रण करती है जो किसी कल्पना से कम नहीं लगता। ऐसा कहा जाता है कि जिसकी कल्पना की जा सकती है, उसे पाया भी जा सकता है। यह फिल्म हमारे सामने एक ऐसी आदर्श व्यवस्था प्रस्तुत करती है और साथ ही यह भी बताने की कोशिश करती है कि ऐसा आदर्श समाज, राज्य, नायक और प्रजा इस धरती पर पहले भी हुए हैं। लोगों में एक विश्वास भरती है कि हम भी कुछ कर सकते हैं। आम लोगों के बीच में पला बढ़ा नायक धर्म की स्थापना करता है और सत्य के लिए संघर्ष करता है।
वैसे तो हर समाज को एक नायक की तलाश रहती है लेकिन एक ऐसा समाज जिसके पास बताने के लिए 5000 साल के गौरव की कहानी हो, उसे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रहती है कि उसके अलग-अलग दौर का नायक कैसा था और उसका आज का नायक कैसा होगा।

वैसे कई फिल्म रिव्यू पढ़कर ऐसा लगा कि कुछ लोगों को बाहुबली फिल्म अजीब लगी। यह हमारी माया नगरी में होना स्वाभाविक भी है क्योंकि यहां सीरियल किसर और पॉर्न स्टार को हमारे ऊपर नायक और नायिका के रूप में थोपा जाता है जिनकी कहानियों का कथानक उस काली कोठरी से गुजरने जैसा होता है जिसमें आपका जिस्म और मन दोनों के काले होने के निकलने की संभावना बहुत बढ़ जाती है लेकिन डार्क और रियलिस्टिक सिनेमा के नाम पर आपके सामने फूहड़ता परोस दी जाती है।
दिए हुए वचन के लिएसत्य और न्याय के लिएधर्म स्थापना के लिएकिसी के भी विरुद्ध जाना पड़े, वो चाहे परमात्मा ही क्यों न होतो भयभीत ना होयही धर्म है’- आज के दौर में जब संप्रेषण के सबसे प्रभावी माध्यम से यह संवाद डॉल्बी डिजिटल में गूंजता है तो हर भारतीय के सामने एक आदर्श प्रस्तुत होता है। समाज के बीच से निकला नायक अपनी मां, प्रेमिका, जनता और राज्य के लिए कैसे न्यायोचित, तर्कसंगत और धर्मनिष्ठ भूमिका निभाता है ये हमें इस फिल्म से पता चलता है।

क्या आंबेडकर राष्ट्रवाद के खिलाफ थे?

डॉ भीमराव अंबेडकर और राष्ट्रवाद पर नवभारत टाइम्स में प्रकाशित मेरा लेख.

भारत रत्न डॉ. भीम राव आंबेडकर आज के दौर में भारत के सबसे महान नेता, विचार और सामाजिक दार्शनिक के रूप में उभर कर आए हैं। उनके जन्मदिवस की 125 वर्षगांठ उनके जन्मशताब्दी वर्ष से अधिक हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। एक बड़ी पत्रिका ने उन्हें आधुनिक भारत का महानतम नेता बताया। इस तरह से कहा जा सकता है कि आंबेडकर के विचार वर्तमान दौर के विमर्श में और अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं।
1947 से पहले स्वतंत्रता ही देश का मुख्य स्वर था और साथ में कई अलग-अलग स्वर भी थे। सबसे प्रभावशाली स्वर कांग्रेस का था जो अंग्रेज उपनिवेशवादियों से देश को आजाद कराना चाहते थे। एक स्वर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी था जो तब तक बहुत कमजोर था और भारत के पुनर्निमाण की बात कर रहा था। उनका मानना था कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को मजबूत करके ही देश का पुनरुद्धार किया जा सकता है।
इसी दौर में आंबेडकर भी एक मजबूत स्वर के रूप में उभरे। उन्होंने सामाजिक असमानता और छुआछुत से आजादी की बात कही। इसे राष्ट्रवाद का सबाल्टर्न रूप कह सकते हैं जिसमें नीचे से आवाजें उठती हैं और जो समाज के सबसे कमजोर, वंचित और शोषित वर्ग की बात करता है जो औपनिवेशक भारत के सामाजिक जीवन में कहीं हिस्सा नहीं ले रहा था। बाबा साहब आंबेडकर इन 6 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि बन गए। समाज के इस वर्ग की मुक्ति के बिना भारत का स्वतंत्रता आंदोलन पूर्ण नहीं था। 20वीं सदी के भारत की आजादी का आंदोलन सिर्फ अंग्रेजों से राजनीतिक शक्ति हासिल करना नहीं था बल्कि भारत को रूढ़िवादी परंपराओं और संस्थाओं से मुक्ति दिलाकर एक आधुनिक राष्ट्र बनाना भी था।
आंबेडकर के प्रयासों के कारण ही ये विचार विकसित हुआ कि हमें आंतरिक और बाहरी गुलामी से स्वतंत्रता पानी है। इसके परिणामस्वरूप हमारे राष्ट्रवादी आंदोलन को आंतरिक मजबूत से किया और उसका सामाजिक आधार फैलाया।
आंबेडकर राष्टवाद के खिलाफ नहीं थे लेकिन कांग्रेस के राष्ट्रवाद के खिलाफ थे जो भारत को अंग्रजों से आजाद करने की बात तो करता था लेकिन ब्राह्मणवादी शोषण पर चुप था जिसके कारण करोड़ों लोग सैकड़ों सालों से शोषण का शिकार थे। आंबेडकर के दबाव में ही कांग्रेस ने वंचित वर्ग की समस्याओं का राजनीतिक स्तर पर संज्ञान लिया जिससे अधिक से अधिक लोग आजादी के आंदोलन से जुड़ने लगे।

शुरुआत से ही आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की प्रवृत्ति उच्चवर्ग (ऊंची जाति) से प्रभावित थी जिसमें उसी वर्ग के लोगों के हित की बात की जाती थी। इसलिए जब इन राष्ट्रवादीनेताओं ने राष्ट्रीय हितों की बात कही तो बस अपने वर्गीय हितों की बात कही। इस प्रवृत्ति को पंडित नेहरू ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में इन शब्दों में देखा जा सकता है, दर्शन और धर्म, इतिहास और परंपरा, सामाजिक तानेबाने और रीतिरिवाज के मिश्रण से ही भारतीय जनजीवन लगभग सभी हिस्से बनकर तैयार होते हैं जिसे ब्राह्मणवाद या हिंदू कहा जा सकता है और यही भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया है।

Sunday, 25 November 2018

Glimpses from my US Visit in October-November 2018


...

Debate on Ayodhya Ram Temple Issue on Zee Salam


Atal Bihari Vajpayee's 93rd birthday: The man who brought governance and development into political agenda

I wrote this article on the 93 birth anniversary of Vajpayee for Firstpost.
You can read a version of the article below:

Governments come and go and parties are born and disappear. Above it all, the country must stay shining, its democracy immortal. Former prime minster Atal Bihari Vajpayee said this while speaking at the Confidence Motion in Parliament on 28 May, 1996. The government that was formed that day ran for only thirteen days as he was not ready for horse-trading of MPs.
In the course of his long political journey, Vajpayee's personal integrity did not receive a single stain and his political chastity and credibility remained impeccable. Better known as Atalji, he could easily make space among people through his mild manners, gentle humour and poetic lilt. After Jawaharlal Nehru, he is the only Indian political leader under whose direction a party won three general elections in a row.
Vajpayee was conferred the Padma Vibhushan in 1992 and in 1994 he was named the best parliamentarian. At the BJP convention in November, 1995, he was declared the prime ministerial candidate for the upcoming Lok Sabha polls. In 1996, BJP emerged as the single largest party and Vajpayee took oath as the prime minister. This government , however, did not last long. In his historical speech in Parliament during the floor test he said that he will not touch corruption even with a kitchen tong (chimta). The government fell one by one.

Politics of Governance

The six years during which Vajpayee led the country, redefined Indian politics. BJP contested the elections with the slogan of ‘Able leadership, Stable Government’ and Vajpayee gave the country a much-needed stable government.
During his term as the prime minster, Vajpayee took several new initiatives. In 1998, showing great political dynamism and gusto, he green-signalled the nuclear tests that made India a full nuclear power. The USA and other countries put India under sanctions which failed to have an impact. Within one-and-a-half year, first President Bill Clinton and then other world leaders visited India and signed partnership agreements. For the first time India was beginning to make its foray as an emerging world power.
The reforms pushed by the Vajpayee government, improved the country's economic growth rate which reached 6-7 percent and the benefits of this percolated to the grassroots. Employment was generated, record foreign investment was registered and infrastructure improved like never before. India emerged as an IT super power in the world. People felt development work around them.
Vajpayee started an ambitious project to connect four ends of India with a four-lane road. It was a herculean task given the sheer volume of the project. The Golden Quadrilateral project started to became a reality with an average of 15-km road being laid each day. This project helped in putting economy on growth track. Another related project was the Prime Minster Gram Sadak Yojana whose target was to connect all the villages with the city roads.
At a BJP national executive held on 15th April, 2000, he wondered 'What after political success'. He also answered his own question saying now that the party had governments in centre and many states, its leaders should make efforts to improve the quality of governance. National interest and people ’s service should be our top priority while doing politics of governance, he said.
Vajpayee declared his long-time associate and Union Home Minster LK advani as the Deputy Prime Minster. The then BJP president Venkaiah Naidu termed Vajpayee as Vikas Purursh (Man of Development) and Advani as Lauh Purursh (Iron Man) in 2002.
On 12 January, 2004 at the Hyderabad BJP national executive, Vajpayee announced the decision to go in for elections. He said, the BJP is not just a political party but a movement of social transformation. "Different sections of the society are coming to our fold. We should again take verdict of the people and try to fulfil their aspiration. We should make all our efforts to make India a develop country by 2020," he said.
BJP lost 2004 general elections by a few seats. Atalji said after the results, "We have lost the government but we have not lost sight of our commitment to national service. We have lost elections not the determination. Victory or loss are integral parts of life, we accept them with equanimity." Atalji gave up political life in 2005. In 2015, President Pranab Mukherjee visited Vajpayee at his house in a special gesture and conferred the highest civilian honour - the Bharat Ratna - to him.
Observing his commitment to governance and development, the central government has decided to celebrate his birthday as Good Governance Day. Besides being a man of masses, an author, journalist and thinker, Atalji also was a great administrator and statesman. He set the new standard of politics - one of governance and development - inspiring millions who contribute to the country's social and political life.

Spotlight

This Eklavya won't sacrifice his thumb

My article on aspirations of the Indian youth was published in The Pioneer .  You can read a version of the article here                  ...